कौन थे प्रबोधनकार? ( हिंदी)
प्रबोधनकार केशव सीताराम ठाकरे। वैसे तो उनकी पहचान एक सत्यशोधक आंदोलन के चोटी के समाज सुधारक और प्रभावी लेखक की रही है। लेकिन उनका कर्तृत्व और प्रतिभा अनेकानेक रंगों में पुष्पित-पल्लवित हुई। विचारवंत, नेता, लेखक, पत्रकार, संपादक, प्रकाशक, वक्ता, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, इतिहास संशोधक, नाटककार, सिनेमा पटकथा संवाद लेखक, अभिनेता, संगीतज्ञ, आंदोलनकारी, शिक्षक, भाषाविद, लघु उद्योजक, फोटोग्राफर, टाइपिस्ट, चित्रकार जैसे दर्जनों विशेषण अर्पित करने के बावजूद उनका व्यक्तित्व एक दशांगुल ऊंचा ही रहेगा। उन्होंने खजूर की तरह ऊंचा होने की बजाय वटवृक्ष की तरह अपने व्यक्तित्व को विस्तृत किया। मानो एक ही व्यक्ति ने सौ लोगों का आयुष्यमान जीने का पुरुषार्थ किया हो।
सामने दिखते ही अन्याय पर टूट पडनेवाला और इसी शक्ति के बल पर बीसवीं सदी में महाराष्ट्र को एक नई दिशा देनेवाला व्यक्तित्व, मुट्ठीभर लोगों के घरों में दबे हुए सामर्थ्य के प्रकाश को अपनी बुध्दिमत्ता और आंदोलन से सर्व सामान्य घरों तक पहुंचाया। विचार और कृति के माध्यम से महाराष्ट्र का इतिहास और भूगोल बदलने का श्रेय जिन चंद लोगों के नाम दर्ज है उनमें प्रबोधनकार का नाम अग्रणी है। उन्हें किसी चौखट में फंसना अमान्य था। इसी के चलते आज भी किसी एक विचारधारा या इज्म का चश्मा डालकर उनको नहीं देखा जा सकता। वे एक ही समय बहुजनवादी भी थे और हिंदुत्ववादी भी। जिन लोगों को प्रबोधनकार अच्छे लगे उन्हें उनका ठाकरे होना नहीं पचा और जो ठाकरे होने के चलते उनके प्रेम में पत्रडे उन्हें उनका प्रबोधनकार होने का दंश सालता रहा। परिणामस्वरूप उनका कर्तृत्व सदा-सर्वदा नेपथ्य में रह गया।
बागी बचपन-
प्रबोधनकार की जन्म तारीख है 17 सितंबर, 1885। जन्मगांव पनवेल। लेकिन ठाकरे का मूल गांव है पाली। कुछ लोग इस पाली को मध्य प्रदेश में होने का दावा करते हैं। लेकिन यह पाली और कोई नहीं बल्कि अष्टविनायक गणपति का प्रसिध्द स्थान महाराष्ट्र के रायगड जिले का पाली है। पाली के अष्टविनायक ही ठाकरे के कुलदेवता होने का उल्लेख मिलता है। उनके दादा भिकोबा धोडपकर देवीभक्त साधु पुरुष थे। लेकिन उनमें शाक्तों की सिध्दि परंपरा के पीछे लगनेवाला मानवीय दोष नहीं था। बल्कि उन्होंने 22 वर्षों तक पंढरपूर की वारी के चलते निस्पृह लोकसेवा के व्रत का अखंड पालन किया। उन दिनों कुछ लोगों ने पैसे कमाने के चलते प्लेग देवी बनाई थी। वह भैंसे पर बैठकर गांव-गांव घूमकर पैसे जमा करती। भिकोबा उर्फ तात्या अपना आंगन बुहार रहे थे तभी वह उनके सामने भी आई। उन्होंने अपने हाथ की झात्रडू को सिर्फ जमीन पर पटका और प्लेग देवी पेट में मरोड आई, यह कहते हुए चीखने लगी। प्रबोधनकार में अंधश्रध्दा पर प्रहार करने का संस्कार यहीं से प्रारंभ हुआ।
मां के पिता बाबा पत्की प्रख्यात कानूनविद थे लेकिन उनका पिंड था शिवोपासना और जन सेवा। वर्तमान पनवेल के पहले हार्बर लाइन पर एक स्टेशन है खांदेश्वर। इस खांदेश्वर की स्थापना बाबा पत्की ने ही की थी। प्रबोधनकार ने रैशनलिजम और श्रध्दा के बीच जो संतुलन साधा और प्रश्न किया कि 'मंदिर का धर्म होना चाहिए या धर्म का मंदिर।' उन्हें इस तरह का संतुलन साधने का प्रभाव बाल्य संस्कार से ही प्राप्त हुआ। उन्होंने श्रध्दा की खाल खींची लेकिन वे कभी श्रध्दाविहीन नहीं हुए। इन दोनों से भी अधिक प्रभाव उन पर पडा बय यानी आजी का। पिता की माता। उन्होंने जाति-धर्म की मर्यादा को लांघकर 60 वर्ष दाई का काम किया। प्रबोधनकार कहते हैं कि मैं आजन्म जात-पांत और दहेज का विरोध कर पाया उसकी प्रेरणा बय (आजी) ने दी। विद्यालय से लौटते समय एक महार की परछाई छोटे केशव के शरीर पर पडी। केशव अब अस्पृश्य हो गया, ऐसा ब्राह्मणों के बच्चे चीखने लगे। वै ने उनकी चीख सुनी। उन्होंने उनमें से एक अभ्यंकर नामक बच्चे को आगे खींचा। उसकी परछाई केशव पर डाली और कहा यदि महार की परछाई से कोई महार बनता है तो ब्राह्मण की परछाई से हमारा दादा अब ब्राह्मण हो गया। आनेवाले दिनों में महार जाति का एक सूबेदार गांव में रहने के लिए आया। अंग्रेजी की पांचवीं कक्षा में पढ रहे प्रबोधनकार उसके घर जाकर चाय पीया करते थे। परिणामस्वरूप गांव में बखेडा खडा हो गया। शिकायतें जब आने लगीं तो बय ने जवाब दिया तुम्हारी तरह दारू पीने की बजाय महार के घर की चाय पीना बुरा नहीं। बलि प्रतिपदा के दिन महारन पुकारती थी 'इडा-पीडा टले बलि का राज्य आए', उस समय उन्हें ठाकरे के घर के ओटे पर रंगोली के पीढे पर बैठाकर दीये से परछन ली जाती थी। उसके बाद उन्हें उनकी दीवाली दी जाती थी। यह संस्कार महत्वपूर्ण था। बय अपने वृध्दावस्था में दादर में निवास के दौरान दिवंगत हुईं। उस समय हिंदुओं की सभी जातियों के साथ-साथ मुसलमानों और ईसाइयों ने भी उन्हें कंधा दिया।
पिता सीताराम पंत उर्फ बाळा इसी प्रकार सबकी मदद के लिए आगे बढनेवाले व्यक्ति थे। नौकरी चली गई तब भी बिना घबराए अपनी मर्यादा का पालन करते हुए उन्होंने छोटे उद्योग धंधे किए। उसका प्रबोधनकार पर बडा प्रभाव पडा। सफेदपोशों की तरह 9 से 5 की डयूटी कर परोपजीवी होने की बजाय उन्होंने अपने आयुष्यमान को झोंक दिया। उन्होंने तमाम तरह के कारोबार किए, उन सबका मूल सीताराम की सीख में था। गांव में आग लगे तो सबसे पहले अपना सर्वस्व बिसारकर सीताराम पंत आगे दौडते थे। गांव में प्लेग आया तब भी सीताराम इसी तरह अगुवाई करते थे। इसी प्लेग ने सीताराम को ही अपना शिकार बना लिया। जब पिता दिवंगत हुए तब प्रबोधनकार की उम्र थी केवल 16-17 साल की। पिता की तुलना में मां का प्रभाव ज्यादा महत्वपूर्ण था। उन्होंने प्रबोधनकार को अध्ययन और स्वाभिमान का संस्कार दिया। पिताजी को लॉटरी लगी। उस समय उनकी पगार हुआ करती थी पंद्रह रुपए और लौटरी लगी थी पचहत्तर रुपयों की। मां ने कहा- 'हमें तो अपने मेहनत की रोटी चाहिए।' राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर हराम का हफ्ता मांगनेवालों से ये कौन कहेगा? मां ने उन्हें वाचन विशेषकर समाचार-पत्र पढने की आदत लगा दी। इसी से मराठी पत्रकारिता को नया अध्याय देनेवाला पत्रकार जन्मा।
ठाकरे की जाति सीकेपी यानी चांद्रसेनीय कायस्थ प्रभु। बचपन में किसी ब्राह्मण सहपाठी से पानी मांगा तो वह तपेले से पानी ले आता था। वह चौखट के नीचे खडा कर अंजुलि से पानी पिलाता था। मित्र की मां वह तपेली बिना धोए घर के अंदर नहीं ले जाने देती थी। शुरू में प्रबोधनकार इसे नहीं समझ पाते थे। जब समझ में आया तो उन्होंने इस अस्पृश्यता का मजाक उडाना शुरू किया और वे यह मजाक आजन्म उडाते रहे। पिता की कचहरीवाली मंडली के एक ब्राह्मण बेलिफ के घर धुनधुरमास के निमित्त प्रात:भोजन का कार्यक्रम था। पिता के साथ केशव भी गए थे। उस समय ब्राह्मणों की एक पंगत थी और दूसरी पंगत थी इन दोनों ठाकरे की। भालेराव नाम का तीसरा कारकून तीसरी पंगत में बैठा था। परोसनेवाली महिलाएं भोजन ऊपर से डालती थीं। भोजन होने के बाद पिता दोनों के बर्तन स्वयं साफ करने लगे। इस पर केशव चिढ गया। ये ब्राह्मण अगर हमसे अलग तरीके से पेश आते हैं तो हम इन्हें अपनत्व का आदर क्यों दें? प्रबोधनकार के ये बागी तेवर उनकी उम्र के आठवीं वर्ष में थे।


































